Wednesday, August 19, 2015

गाजी बाबा की मजार का सच और भविष्य की कसाब बाबा की मज़ार

हजारो निर्दोष लोगो के हथियारे कसाब को फांसी हो चुकी है !
मान लो एक खास संप्रदाय के लोग उसे शहीद का दर्जा दे देते है !
और उसकी मजार बना देते है फिर वहाँ रोज माथाटेकना शुरू कर देते है 10-15 साल बाद भीड़ को देखते हुए हिन्दू भी वहाँ माथा टेकने लग जाते है !!
और 30 -35 साल बाद वह मजार (कसाब बाबा की मजार ) के नाम से प्रचलित हो जाती है प्रतिदिन सैंकड़ों हिन्दू आते है माथा टेकते है ,मन्नते मांगते है ! 60-65 साल बाद लोग कसाबका इतिहास भुला चुके होते है और तब कई तरह की अफवाए फैलाई जा चुकी होती है की कसाब तो राम केअवतार थे फलाना थे डमाका थे , उन्होने ये चमत्कार किए थे !और एक दिन कोई संत कसाब की पुजा करने को गलत बताता है और उसे राम ,कृष्ण शिवजी आदि के साथ जोड़ने का विरोध करता है
और
तब मूर्ख हिन्दू बिना उस संत की बात सुने बिना कसाब बाबा की मजार का इतिहास पढे उस संत के पुतले फूंकते हैक्या कहेंगे आप इसे ?
ऊपर लिखी बात अगर आपको कल्पना लगती है तो एक बार ये पढ़ें !!
पूर्वी उत्तर प्रदेश में एक शहर है,बहराइच ।
बहराइच में हिन्दू समाज का सबसे मुख्य पूजा स्थल है गाजी बाबा की मजार। मूर्ख हिंदू लाखों रूपये हर वर्ष इस पीर पर चढाते है।
इतिहास जानकर, हर व्यक्ति जानता है कि महमूद गजनवी के उत्तरी भारत को १७ बार लूटने व बर्बाद करने के कुछ समय बाद उसका भांजा सलार गाजी भारत को दारूल इस्लाम बनाने के उद्देश्य से भारत पर चढ़ आया ।
(कुरान के अनुसार दर-उल -इस्लाम = 100% मुस्लिम जनसँख्या )
वह पंजाब ,सिंध, आज के उत्तर प्रदेश को रोंद्ता हुआ बहराइच तक जा पंहुचा।
रास्ते में उसने लाखों हिन्दुओं का कत्लेआम कराया,लाखों हिंदू औरतों के बलात्कार हुए, हजारों मन्दिर तोड़ डाले।
राह में उसे एक भी ऐसा हिन्दू वीर नही मिला जो उसका मान मर्दन कर सके। इस्लाम की जेहाद की आंधी को रोक सके।
परंतु बहराइच के राजा सुहेल देव राजभार ने उसको थामने का बीडा उठाया ।
वे अपनी सेना के साथ सलार गाजी के हत्याकांड को रोकने के लिए जा पहुंचे ।
महाराजा व हिन्दू वीरों ने सलार गाजीव उसकी दानवी सेना को मूली गाजर की तरह काट डाला । सलार गाजी मारा गया। उसकी भागती सेना के एक एक हत्यारे को काट डाला गया।
हिंदू ह्रदय राजा सुहेल देव राजभार ने अपने धर्म का पालन करते हुए, सलार गाजी को इस्लाम के अनुसार कब्र में दफ़न करा दिया।
कुछ समय पश्चात् तुगलक वंश के आने पर फीरोज तुगलक ने सलारगाजी को इस्लाम का सच्चा संत सिपाही घोषित करते हुए उसकी मजार बनवा दी।
आज उसी हिन्दुओं के हत्यारे, हिंदू औरतों के बलातकारी ,मूर्ती भंजन दानव को हिंदू समाज एक देवता की तरह पूजता है।
सलार गाजी हिन्दुओं का गाजी बाबा हो गया है।
हिंदू वीर शिरोमणि सुहेल देव भुला दिए गएँ है और सलार गाजी हिन्दुओं का भगवन बनकर हिन्दू समाज का पूजनीय हो गया है।
अब गाजी की मजार पूजने वाले ,ऐसे हिन्दुओं को मूर्ख न कहे तो क्या कहें ?
जिन भाइयों को इसके लिए लिंक चाहिए उनके लिए -
http://jhindu.blogspot.in/2012/01/blog-post_6336.html
ॐ शांति

कांग्रेसी मानसिकता और स्वतंत्रता सेनानियों का अपमान

27 फ़रवरी 1931 को चंद्रशेखर आज़ाद की शहादत के कुछ वर्षों बाद उनके पिता जी की भी मृत्यु हो गयी थी. आज़ाद के भाई की मृत्यु भी इससे पहले ही हो चुकी थी. पति की मृत्यु के पश्चात आज़ाद की निर्धन माताश्री जग्रानी देवी उस वृद्धावस्था में भी किसी के आगे हाथ फ़ैलाने के बजाय जंगलों में जाकर लकड़ी और गोबर बीनकर लाती थी तथा कंडे और लकड़ी बेचकर अपना पेट पालती रहीं.
अगस्त 1947 तक जेल में फंसे रहे चंद्रशेखर आज़ाद के क्रन्तिकारी साथी सदाशिव राव मलकापुरकर को जब आज़ाद की माता की इस स्थिति के विषय में पता चला तो वे उनको लेने उनके घर पहुंचे और अपने घर झाँसी लेकर आये. क्योंकि उनकी स्वयं की स्थिति अत्यंत जर्जर होने के कारण उनका घर बहुत छोटा था अतः उन्होंने आज़ाद के ही एक अन्य मित्र भगवान दास माहौर के घर पर आज़ाद की माताश्री के रहने का प्रबंध किया था और उनके अंतिम क्षणों तक उनकी सेवा और सम्मान अपनी माँ के समान करते हुए उनका अंतिम संस्कार स्वयं अपने हाथों से ही किया था.
मार्च 1951 में चंद्रशेखर आज़ाद की माताश्री के देहांत के पश्चात झाँसी की जनता ने उनकी स्मृति में उनके नाम से एक सार्वजनिक प्याऊ की स्थापना की और उस प्याऊ के पास ही चंद्रशेखर आज़ाद की माताश्री की मूर्ति स्थापित करने का फैसला किया. आज़ाद के ही एक अन्य साथी तथा कुशल शिल्पकार रूद्र नारायण सिंह जी ने आज़ाद की माताश्री के चेहरे की प्रतिमा तैयार कर दी थी.
झाँसी के नागरिकों के इन राष्ट्रवादी तेवरों से तिलमिलाई कांग्रेस की सरकार ने अमर बलिदानी चंद्रशेखर आज़ाद की माताश्री की मूर्ति स्थापना को देश और झाँसी की कानून व्यवस्था के लिए खतरा घोषित कर उनकी मूर्ति स्थापना के कार्यक्रम को प्रतिबंधित कर के पूरे झाँसी शहर में कर्फ्यू लगा दिया ताकि अमर बलिदानी चंद्रशेखर आज़ाद की माताश्री की मूर्ति की स्थापना ना की जा सके.
सदाशिव जी चंद्रशेखर आज़ाद की माताश्री की मूर्ति अपने सिर पर रखकर इस एलान के साथ कर्फ्यू तोड़कर अपने घर से निकल पड़े थे कि यदि चंद्रशेखर आज़ाद ने मातृभूमि के लिए अपने प्राण बलिदान कर दिए थे तो आज मुझे अवसर मिला है कि उनकी माताश्री के सम्मान के लिए मैं अपने प्राणों का बलिदान कर दूं. कांग्रेस की सरकार ने सदाशिव जी को गोली मार देने का आदेश दे डाला था किन्तु आज़ाद की माताश्री की प्रतिमा को अपने सिर पर रखकर प्याऊ की तरफ बढ़ रहे सदाशिव जी को जनता ने चारों तरफ से अपने घेरे में लेकर आगे बढ़ना शुरू कर दिया था l
अतः सरकार ने उस भीड़ पर भी गोली चलाने का आदेश दे डाला था. परिणामस्वरूप झाँसी की उस निहत्थी निरीह राष्ट्रभक्त जनता पर पुलिस की बंदूकों की गोली बरसने लगीl सैकड़ों लोग घायल हुए, दर्जनों लोग जीवन भर के लिए अपंग हुए और तीन लोग मौत के घाट उतर गए थे. कांग्रेसी सरकार के इस खूनी तांडव का परिणाम यह हुआ था कि चंद्रशेखर आज़ाद की माताश्री की मूर्ति स्थापित नहीं हो सकी थी और आते-जाते अनजान नागरिकों की प्यास बुझाने के लिए उनकी स्मृति में बने प्याऊ को भी पुलिस ने ध्वस्त कर दिया था.
अमर बलिदानी चंद्रशेखर आज़ाद की माताश्री की 2-3 फुट की मूर्ति के लिए उस देश में 5 फुट जमीन भी देने से उस देश कि सरकार ने इनकार कर दिया था, जिस देश के लिए चंद्रशेखर आज़ाद ने अपने प्राण न्योछावर कर दिए थे. कांग्रेस सरकारों ने हमे सिर्फ यह समझाने की कोशिश की है कि देश की आज़ादी का इकलौता ठेकेदार जवाहरलाल नेहरू था|
क्यूंकि कुछ लोगो को हर बात में लिंक चाहिए होता है , उनके लिए
http://atvnewschannel.tv/…/%E0%A4%B9%E0%A4%95%E0%A5%80%…/384
ॐ शांति