Friday, October 23, 2015

अभिमान

भले ही हम इस अभिमान में रहें......
कि हमारे पास इतनी जमीन और इतना बड़ा मकान है ....... परन्तु बैठने के लिए स्थान उतना ही काम आएगा ....... जितने में हमारा स्थूल शरीर रह सकता है ।
अधिक पाने की लालसा ही मनुष्य को दुखी बनाती है ।
क्योकि अधिक पा लेना ही सुख का आधार नही है बल्कि उससे तो झंझट, दुःख और कष्ट और ही बढ़ते हैं ।भले ही हम इस अभिमान में रहें कि हमारे पास इतनी जमीन और इतना बड़ा मकान है परन्तु बैठने के लिए स्थान उतना ही काम आएगा जितने में हमारा स्थूल शरीर रह सकता है ।


खाएंगे भी उतना ही जितना शरीर को भूख मिटाने के लिए चाहिए, पहनेगे भी उतना ही जितना शरीर को ढकने के लिए चाहिए । इसलिए हमारे पास जो कुछ भी है उसी में संतुष्ट रहने से सुख मिलेगा । दुनिया में ऐसे बहुत से लोग हैं जिनके पास हमारे से भी कम है किन्तु फिर भी वे आनन्द के साथ रहते हैं ।
मानसिक शान्ति के लिए हमे इन स्थूल चीजों की नही बल्कि कुछ विशेष बातों को अपने में धारण करने की आवश्यकता है....यदि हम दूसरों के भाग्य को देख उनसे ईर्ष्या ना करे, दूसरों की आलोचना ना करें, अपने जीवन में आने वाले हर सुख दुःख को अपने ही पूर्व कर्मो का फल मान कर स्वीकार करें ।
किसी से कोई अपेक्षा ना रखें और भगवान पर भरोसा रख अपनी मदद स्वयं करें तो जीवन की इस दौड़ में हम सहजता और सफलतापूर्वक आगे बढ़ते जायेंगे ।और जीवन की सरल, सुखद व शांतमय बना सकेंगे ।

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