Thursday, October 15, 2015

गीता दर्पण - प्रश्न उत्तर


प्रश्न ‒परमात्मा तो सर्वव्यापी हैं, फिर उनको (३ । १५ में) केवल यज्ञमें नित्य प्रतिष्ठित क्यों कहा गया है ? क्या वे दूसरी जगह नित्य प्रतिष्ठित नहीं हैं ?
उत्तरसर्वव्यापी परमात्माको यज्ञ अर्थात् कर्तव्यकर्ममें नित्य प्रतिष्ठित कहनेका तात्पर्य है कि यज्ञ उनका उपलब्धि-स्थान है । जैसे जमीनमें सब जगह जल होनेपर भी वह कुएँसे प्राप्त होता है, ऐसे ही परमात्मा सब जगह परिपूर्ण होनेपर भी अपने कर्तव्यकर्मका निष्कामभावपूर्वक पालन करनेसे प्राप्त होते हैं । तात्पर्य है कि अपने कर्तव्य-कर्मका पालन करनेसे सर्वव्यापी परमात्माका अनुभव हो जाता है ।

प्रश्न‒भगवान्‌ कहते हैं कि मैं भी कर्तव्यका पालन करता हूँ; क्योंकि अगर मैं सावधानीपूर्वक कर्तव्यका पालन न करूँ तो लोग भी कर्तव्यच्युत हो जायँगे (३ । २२-२४), तो फिर वर्तमानमें लोग कर्तव्यच्युत क्यों हो रहे हैं ?
उत्तर‒भगवानके वचनों और आचरणोंका असर उन्हीं लोगोंपर पड़ता है, जो आस्तिक हैं, भगवान्‌पर श्रद्धा-विश्वास रखनेवाले हैं । जो भगवान्‌पर श्रद्धा-विश्वास नहीं रखते, उनपर भगवान्‌के वचनों और आचरणोंका असर नहीं पड़ता ।
प्रश्नज्ञानवान् पुरुष अपनी प्रकृति-(स्वभाव-) के अनुसार चेष्टा करता है (३ । ३३), पर वह बँधता नहीं । अन्य प्राणी भी अपनी प्रकृतिके अनुसार ही चेष्टा करते हैं, पर वे बँध जाते हैं । ऐसा क्यों ?
उत्तरज्ञानी महापुरुषकी प्रकृति तो राग-द्वेषरहित, शुद्ध होती है; अतः वह प्रकृतिको अपने वशमें करके ही चेष्टा करता है, इसलिये वह कर्मोसे बँधता नहीं । परंतु अन्य प्राणियोंकी प्रकृतिमें राग-द्वेष रहते हैं और वे प्रकृतिके वशमें होकर राग-द्वेषपूर्वक कार्य करते हैं, इसलिये वे कर्मोसे बँध जाते हैं । अतः मनुष्यको अपनी प्रकृति, अपना स्वभाव शुद्ध‒निर्मल बनाना चाहिये और अपने अशुद्ध स्वभावके वशमें होकर कोई कार्य नहीं करना चाहिये ।
प्रश्नचौथे अध्यायके सातवें श्लोकमें भगवान्‌ने कहा है कि मैं अपने-आपको साकाररूपसे प्रकट करता हूँ, और फिर वे नवें अध्यायके चौथे श्लोकमें कहते हैं कि मैं अव्यक्तरूपसे सम्पूर्ण संसारमें व्याप्त हूँ, तो जो एक देशमें प्रकट हो जाते हैं, वे सब देशमें कैसे व्याप्त रह सकते हैं और जो सर्वव्यापक हैं, वे एक देशमें कैसे प्रकट हो जाते हैं ?
उत्तरजब एक प्राकृत अग्नि भी सब जगह व्यापक रहते हुए एक देशमें प्रकट हो जाती है और एक देशमें प्रकट होनेपर भी अग्निका सब देशमें अभाव नहीं होता, फिर भगवान्‌ तो प्रकृतिसे अतीत हैं, अलौकिक हैं, सब कुछ करनेमें समर्थ हैं, वे अगर सब जगह व्यापक रहते हुए एक देशमें प्रकट हो जायँ तो इसमे कहना ही क्या है ! तात्पर्य है कि अवतार लेनेपर भी भगवान्‌की सर्वव्यापकता ज्यों-की-त्यों बनी रहती है ।


प्रश्न‒कर्मोंका आरम्भ न करना और कर्मोंका त्याग करना‒ये दोनों बातें एक ही हुई; क्योंकि दोनोंमें ही कर्मोंका अभाव है । अतः भगवान्‌को ‘कर्माभावसे सिद्धि नहीं होती’ ऐसा कहना चाहिये था । फिर भी भगवान्‌ने (३ । ४ में) उपर्युक्त दोनों बातें एक साथ क्यों कहीं ?
उत्तर‒भगवान्‌ने ये दोनों बातें कर्मयोग और ज्ञानयोगकी दृष्टिसे अलग-अलग कही हैं । कर्मयोगमें निष्कामभावसे कर्मोंको करनेसे ही समताका पता लगता है; क्योंकि मनुष्य कर्म करेगा ही नहीं तो ‘सिद्धि-असिद्धिमें मैं सम रहा या नहीं’‒इसका पता कैसे लगेगा ? अतः भगवान्‌ कहते है कि कर्मोंका आरम्भ न करनेसे सिद्धिकी प्राप्ति नहीं होती । ज्ञानयोगमें विवेकसे समताकी प्राप्ति होती है, केवल कर्मोंका त्याग करनेसे नहीं । अतः भगवान्‌ कहते हैं कि कर्मोका त्याग करनेमात्रसे सिद्धिकी प्राप्ति नहीं होती । तात्पर्य है कि कर्मयोग और ज्ञानयोग‒दोनों ही मार्गोंमें कर्म करना बाधक नहीं है ।
प्रश्न‒कोई भी मनुष्य हरदम कर्म नहीं करता और नींद लेने, श्वास लेने, आँखोंकी खोलने-मीचने आदिको भी वह ‘मैं करता हूँ’‒ऐसा नहीं मानता तो फिर तीसरे अध्यायके पाँचवें श्लोकमें यह कैसे कहा गया कि कोई भी मनुष्य किसी भी अवस्थामें क्षणमात्र भी कर्म किये बिना नहीं रहता ?
उत्तर‒जबतक स्वयं प्रकृतिके साथ अपना सम्बन्ध मानता है, तबतक वह कोई क्रिया करे अथवा न करे, उसमें क्रियाशीलता रहती ही है । वह क्रिया दो प्रकारकी होती है‒क्रियाको करना और क्रियाका होना । ये दोनों विभाग प्रकृतिके सम्बन्धसे ही होते हैं । परंतु जब प्रकृतिका सम्बन्ध नहीं रहता, तब ‘करना’ और ‘होना’ नहीं रहते, प्रत्युत ‘है’ ही रहता है । करनेमें कर्ता, होनेमें क्रिया और ‘है’ में तत्त्व रहता है । वास्तवमें कर्तृत्व रहनेपर भी ‘है’ रहता है और क्रिया रहनेपर भी ‘है’ रहता है अर्थात् कर्ता और क्रियामें तो ‘है’ का अभाव नहीं होता, पर ‘हैं’ में कर्ता और क्रिया‒दोनोंका अभाव होता है ।
प्रश्न‒वर्षाके साथ तो हवनरूप यज्ञका सम्बन्ध है अर्थात् विधि-विधानसे हवनरूप यज्ञ किया जाय तो वर्षा हो जाती है, फिर भी तीसरे अध्यायके चौदहवें श्लोकमें ‘यज्ञाद्भवति पर्जन्यः’ पदोंमें आये ‘यज्ञ’ शब्दसे हवनरूप यज्ञ न लेकर कर्तव्य-कर्मरूप यज्ञ क्यों लिया गया ?
उत्तर‒वास्तवमें देखा जाय तो कर्तव्यच्युत होनेसे, अकर्तव्य करनेसे ही वर्षा नहीं होती और अकाल पड़ता है । कर्तव्य-कर्म करनेसे सृष्टिचक्र सुचारुरूपसे चलता है और कर्तव्य-कर्म न करनेसे सृष्टिचक्रके चलनेमें बाधा आती है । जैसे बैलगाड़ीके चक्के ठीक रहनेसे गाड़ी ठीक चलती है; परन्तु किसी एक भी चक्केका थोड़ा-सा टुकड़ा टूट जाय तो उससे पूरी गाड़ीको धक्का लगता है, ऐसे ही कोई अपने कर्तव्यसे च्युत होता है तो उससे पूरी सृष्टिको धक्का लगता है । वर्तमान समयमें मनुष्य अपने-अपने कर्तव्यका पालन नहीं कर रहे है, प्रत्युत अकर्तव्यका आचरण कर रहे है, इसी कारण अकाल पड़ रहा है, कलह-अशान्ति बढ़ रही है । अगर मनुष्य अपने-अपने कर्तव्यका पालन करें तो देवता भी अपने-अपने कर्तव्यका पालन करेंगे और वर्षा हो जायगी ।
दूसरी बात, अर्जुनका प्रश्र (३ । १-२) और भगवान्‌का उत्तर (३ । ७-९) तथा प्रकरण (३ । १०-१३) को देखा जाय तो कर्तव्य-कर्मका ही प्रवाह है; और आगेके श्लोकों (३ । १४-१६) में भी कर्तव्य-कर्मकी ही बात है । अतः यहाँ कर्तव्य-कर्मरूप यज्ञ लेना ही ठीक बैठता है ।


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