खुद को सेक्युलर बताने वाले तत्वों के दोहरे मानदंड को उजागर कर रहे है लेखक तुफैल अहमद आज के सम्पादकीय पृष्ठ पर दैनिक जागरण के
बहुत ही सही विश्लेषण किया है अहमद साहिब ने जो आज के मीडिया , सेकुलरिस्टों और वाम्पंथियों के दुष्कर्म को पूरी तरह उजागर कर रहा है |
जब भीड़ दादरी में किसी मुस्लिम को मारती है तो सभी को दिखता है लेकिन जब भीड़ किसी और धर्म के नुमाइंदे को मेरठ में या हाजीपुर में या इलुरू या मुंबई भांडुप में मारती है तो इनको कुछ दिखाई नहीं देता क्यूंकि इनके चश्मे का रंग सिर्फ एक समाज के लोगो को ही देखता है |
और एक बात को उजागर किया है लेखक ने कि ये तथाकथित सेक्युलरिस्ट जमात आधी
पाकिस्तानी भी है जिसकी हमदर्दी गुलाम अली से तो है जिसको सेक्युलर सरकारे
चाहे केजू की हो या अखिलेश की, अपने राज्य में आमंत्रित करके अपना शो करने
को कहती है, लेकिन इसकी हमदर्दी ऑस्कर पुरूस्कार विजेता AR रहमान से नहीं
है या सलमान रुश्दी जैसे भारतीय लेखको से भी नहीं है |
ईश्वर इनको सद्बुद्धि दे जिससे ये इस तरह के देशद्रोह के कृत्य करने से अपने आप को बचा पाए |
ॐ शांति
ईश्वर इनको सद्बुद्धि दे जिससे ये इस तरह के देशद्रोह के कृत्य करने से अपने आप को बचा पाए |
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